ऋग्वेद (मंडल 6)
विश्वे॑ दे॒वा मम॑ शृण्वन्तु य॒ज्ञिया॑ उ॒भे रोद॑सी अ॒पां नपा॑च्च॒ मन्म॑ । मा वो॒ वचां॑सि परि॒चक्ष्या॑णि वोचं सु॒म्नेष्विद्वो॒ अन्त॑मा मदेम ॥ (१४)
विश्वेदेव, यज्ञपात्र, स्वर्ग, पृथ्वी एवं अग्नि हमारी इन स्तुतियों को सुनें. हम तुम्हें पंसद न आने वाले स्तुति-वचन न कहें. हम तुम्हारे समीप सुख पाते हुए प्रसन्न हों. (१४)
Listen to these praises of Vishwadev, Yajnapatra, Heaven, Earth and Fire. Let us not tell you words of praise that do not like you. May we be happy to find happiness near you. (14)