ऋग्वेद (मंडल 6)
क्व१॒॑ त्या व॒ल्गू पु॑रुहू॒ताद्य दू॒तो न स्तोमो॑ऽविद॒न्नम॑स्वान् । आ यो अ॒र्वाङ्नास॑त्या व॒वर्त॒ प्रेष्ठा॒ ह्यस॑थो अस्य॒ मन्म॑न् ॥ (१)
सुंदर एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए अश्विनीकुमार जहां कहीं रहते हैं, वहीं हव्यसहित स्तोत्र उन्हें दूत के समान प्राप्त हों. इसी स्तोत्र ने अश्विनीकुमारों को मेरी ओर अभिमुख किया था. हे अश्वििनीकुमारो! तुम स्तोता की स्तुतियों पर परम प्रसन्न होते हो. (१)
Wherever The Beautiful and Many-called Ashwinikumar lives, he may receive hymns like an emissary. It was this hymn that had attracted the Ashwinikumars to me. O Ashwanikumaro! You are extremely pleased with the praises of The Psalms. (1)