ऋग्वेद (मंडल 6)
इ॒यं मद्वां॒ प्र स्तृ॑णीते मनी॒षोप॑ प्रि॒या नम॑सा ब॒र्हिरच्छ॑ । य॒न्तं नो॑ मित्रावरुणा॒वधृ॑ष्टं छ॒र्दिर्यद्वां॑ वरू॒थ्यं॑ सुदानू ॥ (२)
हे प्रिय मित्र एवं वरुण! मेरी यह स्तुति तुम्हें ढक लेती है, हव्य के साथ तुम्हारे पास जाती है एवं तुम्हारे यज्ञ में पहुंचती है. हे शोभनदान वाले मित्र और वरुण! हमें ठंड और हवा रोकने वाला तथा शत्रुओं द्वारा अविजित घर दो. (२)
Oh dear friend and Varun! This praise of Mine covers you up, goes to you with a havya and reaches your yajna. O friend of adornment and Varun! Give us a house that stops the cold and the wind and is undisturbed by the enemies. (2)