ऋग्वेद (मंडल 6)
उदु॒ ष्य दे॒वः स॑वि॒ता हि॑र॒ण्यया॑ बा॒हू अ॑यंस्त॒ सव॑नाय सु॒क्रतुः॑ । घृ॒तेन॑ पा॒णी अ॒भि प्रु॑ष्णुते म॒खो युवा॑ सु॒दक्षो॒ रज॑सो॒ विध॑र्मणि ॥ (१)
शोभनकर्म वाले सविता देव अपनी स्वर्णमय भुजाओं को दान के लिए उठाते हैं. महान्, नित्ययुवा व शोभनबुद्धि सविता लोक को धारण करने के लिए अपने जलपूर्ण हाथों को बढ़ाते हैं. (१)
Savita Dev, who is a gentleman, raises his golden arms for charity. Mahan, Nityayuva and Shobhan Buddhi extend their watery hands to hold savita loka. (1)