हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 6.73.2

मंडल 6 → सूक्त 73 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
जना॑य चि॒द्य ईव॑त उ लो॒कं बृह॒स्पति॑र्दे॒वहू॑तौ च॒कार॑ । घ्नन्वृ॒त्राणि॒ वि पुरो॑ दर्दरीति॒ जय॒ञ्छत्रू॑ँर॒मित्रा॑न्पृ॒त्सु साह॑न् ॥ (२)
जो बृहस्पति स्तुति करने वाले को यज्ञ में स्थान देते हैं, वे ही ढकने वाले अंधकार को दूर करते हुए युद्धों में शत्रुओं को जीतते हैं एवं अमित्रों को हराते हैं. वे राक्षसों के नगरों को बार-बार जलाते हैं. (२)
It is Jupiter who gives place to the one who praises in the yagna, who overcomes the covering darkness, conquers the enemies in wars and defeats the unfriendly. They burn the cities of demons again and again. (2)