ऋग्वेद (मंडल 7)
इ॒दं वचः॑ प॒र्जन्या॑य स्व॒राजे॑ हृ॒दो अ॒स्त्वन्त॑रं॒ तज्जु॑जोषत् । म॒यो॒भुवो॑ वृ॒ष्टयः॑ सन्त्व॒स्मे सु॑पिप्प॒ला ओष॑धीर्दे॒वगो॑पाः ॥ (५)
स्वयं प्रदीप्त पर्जन्य के निमित्त यह स्तोत्र बनाया गया है. पर्जन्य यह स्तोत्र स्वीकार करें. यह उनके मन को भावे. हमारा सुख निर्माण करने वाली वर्षा हो. पर्जन्यों द्वारा सुरक्षित ओषधियां फलवती हों. (५)
This hymn has been created for the purpose of self-illuminated rain. Accept this hymn. It's in their minds. Let it be rain that makes us happy. The drugs protected by the parasites are fruitful. (5)