ऋग्वेद (मंडल 7)
इन्द्रा॑सोमा॒ परि॑ वां भूतु वि॒श्वत॑ इ॒यं म॒तिः क॒क्ष्याश्वे॑व वा॒जिना॑ । यां वां॒ होत्रां॑ परिहि॒नोमि॑ मे॒धये॒मा ब्रह्मा॑णि नृ॒पती॑व जिन्वतम् ॥ (६)
हे इंद्र एवं सोम! जिस प्रकार दोनों ओर बंधी हुई रस्सी घोड़े को बांधती है, उसी प्रकार यह स्तुति तुम्हें प्रभावित करे. मैं बुद्धिबल से यह स्तुति तुम्हारे पास भेज रहा हूं. राजा जिस प्रकार धन से मांगने वाले की इच्छा पूरी करता है, उसी प्रकार तुम इस स्तुति को सफल बनाओ. (६)
O Indra and Mon! Just as a rope tied on both sides binds a horse, so may this praise impress you. I am sending this praise to you wisely. Just as the king fulfills the will of the one who asks for wealth, so do you make this praise a success. (6)