ऋग्वेद (मंडल 7)
प्र ये गृ॒हादम॑मदुस्त्वा॒या प॑राश॒रः श॒तया॑तु॒र्वसि॑ष्ठः । न ते॑ भो॒जस्य॑ स॒ख्यं मृ॑ष॒न्ताधा॑ सू॒रिभ्यः॑ सु॒दिना॒ व्यु॑च्छान् ॥ (२१)
हे इंद्र! अनेक राक्षसों को नष्ट करने वाले पराशर एवं वसिष्ठ ऋषि तुम्हारी कामना करके अपने घर को गए एवं उन्होंने तुम्हारी स्तुति की. वे अपने पालनकर्ता की अर्थात् तुम्हारी मित्रता नहीं भूले थे. उनके दिन सदा शोभन होते हैं. (२१)
O Indra! Parashar and Vasishta sages, who destroyed many demons, went to their homes wishing you and praised you. They did not forget the friendship of their lord. Their days are always awestruck. (21)