हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 28
ब्रह्मा॑ ण इ॒न्द्रोप॑ याहि वि॒द्वान॒र्वाञ्च॑स्ते॒ हर॑यः सन्तु यु॒क्ताः । विश्वे॑ चि॒द्धि त्वा॑ वि॒हव॑न्त॒ मर्ता॑ अ॒स्माक॒मिच्छृ॑णुहि विश्वमिन्व ॥ (१)
हे इंद्र! तुम जानते हुए हमारी स्तुतियों के समीप आओ. तुम्हारे घोड़े हमारे सामने ही रथ में जुड़े हैं. हे सबको प्रसन्न करने वाले इंद्र! यद्यपि तुम्हें सभी लोग बुलाते हैं, फिर भी तुम हमारी पुकार सुनो. (१)
O Indra! Come near to Our praises knowing you. Your horses are attached in the chariot right in front of us. O Indra who pleases everyone! Though you are called by all people, you must hear Our call. (1)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 28
हवं॑ त इन्द्र महि॒मा व्या॑न॒ड्ब्रह्म॒ यत्पासि॑ शवसि॒न्नृषी॑णाम् । आ यद्वज्रं॑ दधि॒षे हस्त॑ उग्र घो॒रः सन्क्रत्वा॑ जनिष्ठा॒ अषा॑ळ्हः ॥ (२)
हे शक्तिशाली इंद्र! जिस समय तुम ऋषियों के स्तोत्रों की रक्षा करते हो, उस समय तुम्हारी महिमा स्तुतिकर्ता को व्याप्त करे. हे उग्र इंद्र! जिस समय तुम अपने हाथ में वज्र पकड़े हो, उस समय कर्म द्वारा भयंकर बनकर शत्रुओं को असहनीय हो जाते हो. (२)
O mighty Indra! At the time when you protect the saints' hymns, let your glory permeate the Praiser. O furious Indra! At the time when you are holding a thunderbolt in your hand, you become fierce by karma and become intolerable to the enemies. (2)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 28
तव॒ प्रणी॑तीन्द्र॒ जोहु॑वाना॒न्सं यन्नॄन्न रोद॑सी नि॒नेथ॑ । म॒हे क्ष॒त्राय॒ शव॑से॒ हि ज॒ज्ञेऽतू॑तुजिं चि॒त्तूतु॑जिरशिश्नत् ॥ (३)
हे इंद्र! जो लोग तुम्हारे कहने के अनुसार तुम्हारी बार-बार स्तुति करते हैं, उन्हें तुम लोक एवं धरती पर स्थापित करते हो. तुमने महान्‌ शक्ति एवं धन लेने के लिए जन्म लिया है. तुम्हारा यजमान यज्ञरहितों की हिंसा करता है. (३)
O Indra! Those who praise you again and again according to what you say, you establish them in the people and on the earth. You are born to take great power and wealth. Your host commits the violence of the sacrificial. (3)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 28
ए॒भिर्न॑ इ॒न्द्राह॑भिर्दशस्य दुर्मि॒त्रासो॒ हि क्षि॒तयः॒ पव॑न्ते । प्रति॒ यच्चष्टे॒ अनृ॑तमने॒ना अव॑ द्वि॒ता वरु॑णो मा॒यी नः॑ सात् ॥ (४)
हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता का ढोंग करने वाले दुष्ट लोग आ रहे हैं. इनसे धन छीनकर हमें दो. पाप नष्ट करने वाले एवं बुद्धिमान्‌ वरुण हमारा जो पाप देखें. उससे हमें हर प्रकार से छुड़ाएं. (४)
O Indra! The evil people who pretend to be your friendship are coming. Take away money from them and give it to us. See the sins of those who destroy sins and the wise ones of us. Rescue us from him in every way. (4)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 28
वो॒चेमेदिन्द्रं॑ म॒घवा॑नमेनं म॒हो रा॒यो राध॑सो॒ यद्दद॑न्नः । यो अर्च॑तो॒ ब्रह्म॑कृति॒मवि॑ष्ठो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (५)
हम उसी धनस्वामी इंद्र की स्तुति करते हैं, जिसने हमें आराधना के योग्य महान्‌ धन दिया एवं स्तोता के स्तुतिकर्म की रक्षा की. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों से हमारी सदा रक्षा करो. (५)
We praise the same rich god, Indra, who gave us great wealth worthy of worship and protected the praise of the Stota. O Indra! You always protect us with welfare means. (5)