हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.3.5

मंडल 7 → सूक्त 3 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
तमिद्दो॒षा तमु॒षसि॒ यवि॑ष्ठम॒ग्निमत्यं॒ न म॑र्जयन्त॒ नरः॑ । नि॒शिशा॑ना॒ अति॑थिमस्य॒ योनौ॑ दी॒दाय॑ शो॒चिराहु॑तस्य॒ वृष्णः॑ ॥ (५)
अतिशय युवा अतिथि के समान पूज्य अग्नि को यज्ञशाला में रात-दिन प्रज्वलित करते हुए लोग सततगामी अश्व के समान उनकी पूजा करते हैं. बुलाए हुए एवं अभिलाषापूरक अग्नि की शिखा दीप्त होती है. (५)
Like a very young guest, people worship him like a continuous horse, lighting the revered agni day and night in the yajnashala. The crest of the summoned and desireful agni is bright. (5)