ऋग्वेद (मंडल 7)
आ पु॒त्रासो॒ न मा॒तरं॒ विभृ॑त्राः॒ सानौ॑ दे॒वासो॑ ब॒र्हिषः॑ सदन्तु । आ वि॒श्वाची॑ विद॒थ्या॑मन॒क्त्वग्ने॒ मा नो॑ दे॒वता॑ता॒ मृध॑स्कः ॥ (३)
विशेष रूप से पालनीय पुत्र जिस प्रकार माता की गोद में बैठता है, उसी प्रकार देवगण कुश बिछी हुई वेदी के ऊंचे स्थान पर बैठे. हे अग्नि! जुहू तुम्हारी यज्ञ के योग्य ज्वाला को भली प्रकार सींचे. तुम युद्ध में हमारे शत्रुओं की सहायता मत करना. (३)
Especially just as the foster son sits on the mother's lap, so the devas sit on the high position of the kush-laid altar. O agni! May Juhu water the flame worthy of your yajna well. You do not help our enemies in the war. (3)