हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.43.4

मंडल 7 → सूक्त 43 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 43
ते सी॑षपन्त॒ जोष॒मा यज॑त्रा ऋ॒तस्य॒ धाराः॑ सु॒दुघा॒ दुहा॑नाः । ज्येष्ठं॑ वो अ॒द्य मह॒ आ वसू॑ना॒मा ग॑न्तन॒ सम॑नसो॒ यति॒ ष्ठ ॥ (४)
यज्ञ के पात्र इंद्रादि देव जल की सुख से दुहने योग्य धाराओं को बरसाते हुए हमारी सेवा को पर्याप्त रूप में स्वीकार करें, हे देवो! आज तुम सब धनों में पूज्य अपना धन लाओ तथा स्वयं भी समान रूप से प्रसन्न होकर आओ. (४)
May indradi dev, the character of the yajna, accept our service in a sufficient way by raining down the milkable streams of water, O Gods! Today, bring your wealth to all the riches that are revered and come with equally happiness. (4)