ऋग्वेद (मंडल 7)
आ दे॒वो या॑तु सवि॒ता सु॒रत्नो॑ऽन्तरिक्ष॒प्रा वह॑मानो॒ अश्वैः॑ । हस्ते॒ दधा॑नो॒ नर्या॑ पु॒रूणि॑ निवे॒शय॑ञ्च प्रसु॒वञ्च॒ भूम॑ ॥ (१)
शोभनरत्नों से युक्त, अपने तेज से अंतरिक्ष को पूर्ण करने वाले एवं अपने घोड़ों द्वारा ढोए जाते हुए सविता देव अनेक मानवहितकारी धनों को हाथ में धारण करते हैं. वे प्राणियों को स्थापित करते हैं एवं कर्म में लगाते हैं. वे यहां आवें. (१)
Savita Dev, who is adorned with adornments, completes the space with her swiftness and is carried by her horses, holds many human-friendly wealth in her hand. They establish beings and put them into action. They come here. (1)