हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.50.3

मंडल 7 → सूक्त 50 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
यच्छ॑ल्म॒लौ भव॑ति॒ यन्न॒दीषु॒ यदोष॑धीभ्यः॒ परि॒ जाय॑ते वि॒षम् । विश्वे॑ दे॒वा निरि॒तस्तत्सु॑वन्तु॒ मा मां पद्ये॑न॒ रप॑सा विद॒त्त्सरुः॑ ॥ (३)
जो विष शाल्मली नामक वृक्ष में होता है एवं जो विष नदियों एवं ओषधियों में जन्म लेता है, विश्वेदेव उस विष को हमसे दूर करें. छिपकर आने वाला सांप हमारी पगध्वनि न पहचान सके. (३)
The poison which occurs in a tree called Shalmali and the poison which is born in rivers and herbs, may Vishvedeva remove that poison from us. The snake coming in hiding cannot recognize our footprints. (3)