हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 58
प्र सा॑क॒मुक्षे॑ अर्चता ग॒णाय॒ यो दैव्य॑स्य॒ धाम्न॒स्तुवि॑ष्मान् । उ॒त क्षो॑दन्ति॒ रोद॑सी महि॒त्वा नक्ष॑न्ते॒ नाकं॒ निरृ॑तेरवं॒शात् ॥ (१)
हे स्तोताओ! तुम सदा वर्षा करने वाले मरुद्गण की पूजा करो. वे देवस्थान स्वर्ग में सबसे अधिक बुद्धिमान्‌ हैं. वे अपनी महिमा से द्यावा-पृथिवी को भी भग्न कर देते हैं. वे स्वर्ग को धरती और अंतरिक्ष की अपेक्षा अधिक व्याप्त बना देते हैं. (१)
This stotao! Worship the eternally raining deserts. They are the most intelligent in godly heaven. They also destroy the dyava-prithvivi with their glory. They make heaven more prevalent than earth and space. (1)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 58
ज॒नूश्चि॑द्वो मरुतस्त्वे॒ष्ये॑ण॒ भीमा॑स॒स्तुवि॑मन्य॒वोऽया॑सः । प्र ये महो॑भि॒रोज॑सो॒त सन्ति॒ विश्वो॑ वो॒ याम॑न्भयते स्व॒र्दृक् ॥ (२)
हे भयानक, अधिक बुद्धि वाले एवं गतिशील मरुतो! तुम्हारा जन्म तेज वाले रुद्रों से हुआ है. तुम तेज एवं बल से प्रभावशाली हुए हो. तुम्हारे गमन में सूर्य को देखने वाले सब लोग डरते हैं. (२)
O terrible, more intelligent and dynamic Maruto! You are born of the fast rudras. You have become powerful by speed and force. Everyone who sees the sun in your journey is afraid. (2)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 58
बृ॒हद्वयो॑ म॒घव॑द्भ्यो दधात॒ जुजो॑ष॒न्निन्म॒रुतः॑ सुष्टु॒तिं नः॑ । ग॒तो नाध्वा॒ वि ति॑राति ज॒न्तुं प्र णः॑ स्पा॒र्हाभि॑रू॒तिभि॑स्तिरेत ॥ (३)
हे मरुतो! तुम हव्य धारण करने वाले को बहुत सा अन्न दो एवं हमारी शोभनस्तुति को अवश्य सुनो, जिस मार्ग से मरुद्गण जाते हैं, वह प्राणियों को कभी नष्ट नहीं करता. वे अपने चाहने योग्य रक्षासाधनों से हमें बढ़ावें. (३)
O Maruto! You must give a lot of food to the one who wears the haavya and listen to our adornment, the way in which the deserts go never destroys the beings. May they raise us with their desired defenses. (3)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 58
यु॒ष्मोतो॒ विप्रो॑ मरुतः शत॒स्वी यु॒ष्मोतो॒ अर्वा॒ सहु॑रिः सह॒स्री । यु॒ष्मोतः॑ स॒म्राळु॒त ह॑न्ति वृ॒त्रं प्र तद्वो॑ अस्तु धूतयो दे॒ष्णम् ॥ (४)
हे मरुतो! तुम्हारे द्वारा रक्षित स्तोता सैकड़ों धनों का स्वामी होता है. तुम्हारी रक्षा पाकर वह आक्रमण करने वाला, शत्रु-पराजयकारी, साहसी एवं हजारों धनों का स्वामी बनता है. तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर वह सम्राट्‌ एवं शन्रुहंता बनता है. हे कंपाने वाले मरुतो! तुम्हारा दिया हुआ धन बढ़े. (४)
O Maruto! The stota you protect is the owner of hundreds of riches. By protecting you, he becomes an invader, an enemy-defeater, a courageous man and a master of thousands of riches. Protected by you, he becomes emperor and shanruhanta. O you who tremble, Marutto! Increase the money you've given. (4)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 58
ताँ आ रु॒द्रस्य॑ मी॒ळ्हुषो॑ विवासे कु॒विन्नंस॑न्ते म॒रुतः॒ पुन॑र्नः । यत्स॒स्वर्ता॑ जिहीळि॒रे यदा॒विरव॒ तदेन॑ ईमहे तु॒राणा॑म् ॥ (५)
मैं अभिलाषापूरक रुद्रों की सेवा करता हूं. वे कई बार हमारे सामने आवें. जिस महान्‌ पाप से मरुद्गण नाराज होते हैं, वह पाप हम अपने स्तोत्र द्वारा नष्ट कर देंगे. (५)
I serve the desireful rudras. They come in front of us several times. The great sin that the deserts are angry with, that sin will be destroyed by our hymns. (5)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 58
प्र सा वा॑चि सुष्टु॒तिर्म॒घोना॑मि॒दं सू॒क्तं म॒रुतो॑ जुषन्त । आ॒राच्चि॒द्द्वेषो॑ वृषणो युयोत यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (६)
हमने धनस्वामी मरुतों की शोभनस्तुति इस स्तोत्र में गाई है. वे उसे स्वीकार करें. हे अभिलाषापूरक मरुतो! तुम शत्रुओं को दूर से ही अलग कर दो. तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (६)
We have sung the adornment of the Dhanaswami Maruts in this hymn. They accept him. This wish-filled Maruto! You separate the enemies from a distance. You protect us forever by your welfare means. (6)