ऋग्वेद (मंडल 7)
क॒विं के॒तुं धा॒सिं भा॒नुमद्रे॑र्हि॒न्वन्ति॒ शं रा॒ज्यं रोद॑स्योः । पु॒रं॒द॒रस्य॑ गी॒र्भिरा वि॑वासे॒ऽग्नेर्व्र॒तानि॑ पू॒र्व्या म॒हानि॑ ॥ (२)
देव प्राज्ञ, केतुरूप, पर्वत धारण करने वाले, दीप्तियुक्त करने वाले, सुखकर एवं धरती- आकाश के राजा अग्नि को प्रसन्न करते हैं. मैं स्तुति द्वारा शत्रुनगरियों को नष्ट करने वाले अग्नि के प्राचीन एवं महान् कार्यो को स्तुतिवचनों द्वारा गाता हूं. (२)
God pragya, keturup, mountain-possessor, the brighter, the happier and the king of the earth- the sky pleases agni. I sing through hymns of praise to the ancient and great works of agni that destroy enemy cities. (2)