हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 72
आ गोम॑ता नासत्या॒ रथे॒नाश्वा॑वता पुरुश्च॒न्द्रेण॑ यातम् । अ॒भि वां॒ विश्वा॑ नि॒युतः॑ सचन्ते स्पा॒र्हया॑ श्रि॒या त॒न्वा॑ शुभा॒ना ॥ (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम गो, अश्व एवं धन से संपन्न रथ के द्वारा आओ. बहुत सी स्तुतियां तुम्हारी सेवा करती हैं. तुम चाहने योग्य शोभा एवं शरीर से युक्त हो. (१)
O Ashwinikumaro! You come by a chariot full of go, horse and wealth. Many praises serve you. You are full of desired splendor and body. (1)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 72
आ नो॑ दे॒वेभि॒रुप॑ यातम॒र्वाक्स॒जोष॑सा नासत्या॒ रथे॑न । यु॒वोर्हि नः॑ स॒ख्या पित्र्या॑णि समा॒नो बन्धु॑रु॒त तस्य॑ वित्तम् ॥ (२)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम समान प्रीति वाले देवों को लेकर रथ द्वारा हमारे सामने आओ. तुम्हारे साथ हमारी पैतृक मित्रता है. हमारे एवं तुम्हारे बांधव एवं धन समान ही है. (२)
O aschinikumaro! You take the gods of equal love and come before us by chariot. We have a paternal friendship with you. Ours and your bonds and wealth are the same. (2)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 72
उदु॒ स्तोमा॑सो अ॒श्विनो॑रबुध्रञ्जा॒मि ब्रह्मा॑ण्यु॒षस॑श्च दे॒वीः । आ॒विवा॑स॒न्रोद॑सी॒ धिष्ण्ये॒मे अच्छा॒ विप्रो॒ नास॑त्या विवक्ति ॥ (३)
स्तुतियां अश्चिनीकुमारों को भली प्रकार जगाती हैं. बंधुतारूपी समस्त यज्ञकर्म उषा को जगाते हैं. बुद्धिमान्‌ वासिष्ठ स्तुतियोग्य द्यावा-पृथिवी की सेवा करता हुआ अश्विनीकुमारों के सामने स्तुति करता है. (३)
The praises awaken the Ashchinakumaras well. All the yajnakarmas of bandhutarupi wake up Usha. The wise vasishtha praises in front of the Ashvinikumaras while serving the praiseworthy Dyava-Prithvivi. (3)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 72
वि चेदु॒च्छन्त्य॑श्विना उ॒षासः॒ प्र वां॒ ब्रह्मा॑णि का॒रवो॑ भरन्ते । ऊ॒र्ध्वं भा॒नुं स॑वि॒ता दे॒वो अ॑श्रेद्बृ॒हद॒ग्नयः॑ स॒मिधा॑ जरन्ते ॥ (४)
हे अश्विनीकुमारो! उषाएं अंधकारों का नाश करती हैं. स्तोता तुम्हारी स्तुति विशेषरूप से करते हैं. सविता देव ऊंचे तेज को धारण करते हैं एवं समिधाओं द्वारा प्रज्वलित अग्नि की स्तुति की जाती है. (४)
O Ashwinikumaro! Ushais destroy darkness. The psalms especially praise you. Savita Dev holds the high brightness and the agni ignited by the samidhas is praised. (4)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 72
आ प॒श्चाता॑न्नास॒त्या पु॒रस्ता॒दाश्वि॑ना यातमध॒रादुद॑क्तात् । आ वि॒श्वतः॒ पाञ्च॑जन्येन रा॒या यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (५)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण से आओ. तुम पांच वर्णो का हित करने वाली संपत्तियों के साथ सब ओर से आओ. हे देवो! कल्याणसाधनों द्वारा तुम सदा हमारी रक्षा करो. (५)
O aschinikumaro! You come from east, west, north and south. You come from all sides with five-character interest-making assets. Oh, God! You always protect us by means of well-being. (5)