हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 74
इ॒मा उ॑ वां॒ दिवि॑ष्टय उ॒स्रा ह॑वन्ते अश्विना । अ॒यं वा॑म॒ह्वेऽव॑से शचीवसू॒ विशं॑विशं॒ हि गच्छ॑थः ॥ (१)
हे निवासदाता अश्विनीकुमारो! स्वर्ग चाहने वाले लोग तुम्हें बुलाते हैं. हे कर्मरूपी धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! यह वसिष्ठ भी रक्षा के लिए तुम्हें बुलाता है, क्योंकि तुम सब प्रजाओं के पास जाते हो. (१)
O resident, Ashwinikumaro! People who want heaven call you. O Lord of karmaroopi wealth, Ashwinikumaro! This Vasishtha also calls you to protect, for you go to all the people. (1)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 74
यु॒वं चि॒त्रं द॑दथु॒र्भोज॑नं नरा॒ चोदे॑थां सू॒नृता॑वते । अ॒र्वाग्रथं॒ सम॑नसा॒ नि य॑च्छतं॒ पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑ ॥ (२)
हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारे पास जो उपभोग के योग्य धन है, उसे स्तोता के पास जाने की प्रेरणा दो. तुम समान रूप से प्रसन्न होकर अपना रथ हमारे सामने लाओ एवं मधुर सोमरस पिओ. (२)
O leader Ashwinikumaro! Inspire the money you have to go to the stota for consumption. You are equally pleased, bring your chariot in front of us and drink the sweet somras. (2)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 74
आ या॑त॒मुप॑ भूषतं॒ मध्वः॑ पिबतमश्विना । दु॒ग्धं पयो॑ वृषणा जेन्यावसू॒ मा नो॑ मर्धिष्ट॒मा ग॑तम् ॥ (३)
हे अश्विनीकुमारो! आओ, हमारे पास बैठो एवं सोमरस पिओ. हे अभिलाषापूरक एवं धन जीतने वाले अश्चिनीकुमारो! जल का दोहन करो, हमें मत मारो एवं जाओ. (३)
O Ashwinikumaro! Come, sit down with us and drink somers. O aspiring and wealth-winning Aschinikumaro! Tap the water, don't kill us and go. (3)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 74
अश्वा॑सो॒ ये वा॒मुप॑ दा॒शुषो॑ गृ॒हं यु॒वां दीय॑न्ति॒ बिभ्र॑तः । म॒क्षू॒युभि॑र्नरा॒ हये॑भिरश्वि॒ना दे॑वा यातमस्म॒यू ॥ (४)
हे नेता अश्चिनीकुमारो! जो घड़े तुम्हें हव्यदाता यजमान के घर में धारण करते हुए पहुंचते हैं, उन्हीं तेज चलने वाले घोड़ों की सहायता से तुम हमारी कामना करते हुए आओ. (४)
O leader Aschinikumaro! Come with the help of the same fast-moving horses that come to hold you to the house of the shepherd host, wishing us. (4)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 74
अधा॑ ह॒ यन्तो॑ अ॒श्विना॒ पृक्षः॑ सचन्त सू॒रयः॑ । ता यं॑सतो म॒घव॑द्भ्यो ध्रु॒वं यश॑श्छ॒र्दिर॒स्मभ्यं॒ नास॑त्या ॥ (५)
हे अश्चिनीकुमारो! स्तुतियों के उच्चारण के साथ चलने वाला यजमान एवं बुद्धिमान्‌ स्तोता बहुत सा अन्न धारण करते हैं. हम अन्नधारियों को स्थायी यश एवं घर दो. (५)
O aschinikumaro! Hosts and wise hymns that run with the pronunciation of praises carry a lot of food. May we give permanent glory and house to the annadharis. (5)

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 74
प्र ये य॒युर॑वृ॒कासो॒ रथा॑ इव नृपा॒तारो॒ जना॑नाम् । उ॒त स्वेन॒ शव॑सा शूशुवु॒र्नर॑ उ॒त क्षि॑यन्ति सुक्षि॒तिम् ॥ (६)
हे अश्चिनीकुमारो! दूसरे का धन ग्रहण न करने वाले एवं मनुष्यों में ऋत्विजों का रक्षण करने वाले जो यजमान रथ के समान तुम्हारे समीप आते हैं, वे अपनी शक्ति से बढ़ते हैं एवं शोभनघर में आश्रय पाते हैं. (६)
O aschinikumaro! Those who do not receive the wealth of others and who protect the ritwijas among men, who come near you like a host chariot, grow by their own power and find shelter in the house of adornment. (6)