ऋग्वेद (मंडल 7)
ए॒ते त्ये भा॒नवो॑ दर्श॒ताया॑श्चि॒त्रा उ॒षसो॑ अ॒मृता॑स॒ आगुः॑ । ज॒नय॑न्तो॒ दैव्या॑नि व्र॒तान्या॑पृ॒णन्तो॑ अ॒न्तरि॑क्षा॒ व्य॑स्थुः ॥ (३)
दर्शनीय उषा की ये विशाल, आश्चर्यजनक एवं विनाशरहित किरणें देवसंबंधी यज्ञों का आरंभ करती हुई एवं अंतरिक्ष को व्याप्त करती हुई आती हैं एवं फैलती हैं. (३)
These huge, stunning and unforeseen rays of the visible Usha come and spread, initiating the divine yagnas and permeating the space. (3)