हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.87.3

मंडल 7 → सूक्त 87 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 87
परि॒ स्पशो॒ वरु॑णस्य॒ स्मदि॑ष्टा उ॒भे प॑श्यन्ति॒ रोद॑सी सु॒मेके॑ । ऋ॒तावा॑नः क॒वयो॑ य॒ज्ञधी॑राः॒ प्रचे॑तसो॒ य इ॒षय॑न्त॒ मन्म॑ ॥ (३)
प्रशंसनीय गति वाले वरुण के सब सहायक शोभनरूप वाली द्यावा-पृथिवी को भली- भांति देखते हैं. वे कर्मयुक्त, यज्ञ करने के लिए दृढ़, बुद्धिमान्‌ एवं वरुण की स्तुति करने वाले कवियों को भी देखते हैं. (३)
All of Varun's assistants with commendable speed see the desha-friendly Diva-Prithvi. They also see poets with karma, determined to perform yajna, wise and praising Varuna. (3)