ऋग्वेद (मंडल 7)
उ॒शन्ता॑ दू॒ता न दभा॑य गो॒पा मा॒सश्च॑ पा॒थः श॒रद॑श्च पू॒र्वीः । इन्द्र॑वायू सुष्टु॒तिर्वा॑मिया॒ना मा॑र्डी॒कमी॑ट्टे सुवि॒तं च॒ नव्य॑म् ॥ (२)
हे कामना करने योग्य, गतिशील एवं रक्षक इंद्र व वायु! तुम हमारी हिंसा न करके अनेक मासों एवं वर्षो तक हमारी रक्षा करना. हमारी शोभनस्तुति समीप जाती हुई तुमसे सुख एवं प्रशंसायोग्य उत्तम धन की याचना करती है. (२)
O wishable, dynamic and protector Indra and the wind! You must protect us for many months and years without violence. Our adornment approaches and asks you for happiness and praiseworthy good wealth. (2)