ऋग्वेद (मंडल 7)
प्र क्षोद॑सा॒ धाय॑सा सस्र ए॒षा सर॑स्वती ध॒रुण॒माय॑सी॒ पूः । प्र॒बाब॑धाना र॒थ्ये॑व याति॒ विश्वा॑ अ॒पो म॑हि॒ना सिन्धु॑र॒न्याः ॥ (१)
यह सरस्वती नदी लोहे के द्वारा बनी नगरी के समान सबको धारण करती हुई प्राणघातक जल के साथ बहती है. जिस प्रकार सारथि सबको पीछे छोड़कर आगे निकल जाता है, उसी प्रकार यह अपनी महिमा द्वारा सब जलपूर्ण नदियों को बाधा देकर आगे बढ़ती है. (१)
This river Saraswati flows with deadly water holding everyone like a city made of iron. Just as the Charioteer leaves everyone behind and goes ahead, so it moves forward by hindering all the water-filled rivers by its glory. (1)