ऋग्वेद (मंडल 7)
प्र क्षोद॑सा॒ धाय॑सा सस्र ए॒षा सर॑स्वती ध॒रुण॒माय॑सी॒ पूः । प्र॒बाब॑धाना र॒थ्ये॑व याति॒ विश्वा॑ अ॒पो म॑हि॒ना सिन्धु॑र॒न्याः ॥ (१)
यह सरस्वती नदी लोहे के द्वारा बनी नगरी के समान सबको धारण करती हुई प्राणघातक जल के साथ बहती है. जिस प्रकार सारथि सबको पीछे छोड़कर आगे निकल जाता है, उसी प्रकार यह अपनी महिमा द्वारा सब जलपूर्ण नदियों को बाधा देकर आगे बढ़ती है. (१)
This river Saraswati flows with deadly water holding everyone like a city made of iron. Just as the Charioteer leaves everyone behind and goes ahead, so it moves forward by hindering all the water-filled rivers by its glory. (1)
ऋग्वेद (मंडल 7)
एका॑चेत॒त्सर॑स्वती न॒दीनां॒ शुचि॑र्य॒ती गि॒रिभ्य॒ आ स॑मु॒द्रात् । रा॒यश्चेत॑न्ती॒ भुव॑नस्य॒ भूरे॑र्घृ॒तं पयो॑ दुदुहे॒ नाहु॑षाय ॥ (२)
सभी नदियों में पवित्र एवं पर्वत से निकलकर सागर तक जाने वाली सरस्वती नदी ने ही केवल राजा नहुष की प्रार्थना को समझा. सरस्वती ने नहुष को सारे संसार का पर्याप्त धन प्रदान करके दूध का दोहन किया था. (२)
In all the rivers, the saraswati river, which is holy and emanating from the mountain to the sea, understood only the prayer of King Nahush. Saraswati had exploited milk by giving Nahush enough wealth of the whole world. (2)
ऋग्वेद (मंडल 7)
स वा॑वृधे॒ नर्यो॒ योष॑णासु॒ वृषा॒ शिशु॑र्वृष॒भो य॒ज्ञिया॑सु । स वा॒जिनं॑ म॒घव॑द्भ्यो दधाति॒ वि सा॒तये॑ त॒न्वं॑ मामृजीत ॥ (३)
मानवों का हित एवं वर्षा करने वाले सरस्वान् नामक वायु यज्ञ के योग्य स्त्री अर्थात् जरासमूह के बीच वृद्धि को प्राप्त हुए. वे हव्य धारण करने वाले यजमानों को शक्तिशाली संतान देते हैं एवं उनके कल्याण के लिए शरीर का संस्कार करते हैं. (३)
In the interest of human beings and the rainers attained the growth among the worthy woman i.e. the jara group of vayu yajna called Sarswan. They give powerful offspring to the hosts who wear the havan and perform the rites of the body for their welfare. (3)
ऋग्वेद (मंडल 7)
उ॒त स्या नः॒ सर॑स्वती जुषा॒णोप॑ श्रवत्सु॒भगा॑ य॒ज्णे अ॒स्मिन् । मि॒तज्ञु॑भिर्नम॒स्यै॑रिया॒ना रा॒या यु॒जा चि॒दुत्त॑रा॒ सखि॑भ्यः ॥ (४)
शोभनधन वाली सरस्वती प्रसन्न होकर इस यज्ञ में हमारी स्तुति सुनें. घुटने टेककर समीप जाने वाले देवों से युक्त सरस्वती धन से नित्य संपन्न होकर अपने मित्रों के लिए क्रमशः दया वाली बनें. (४)
Shobhandhan wali Saraswati is pleased and listen to our praise in this yajna. Be a devotee of compassion for your friends by being constantly endowed with saraswati wealth with the gods who kneel down and go near. (4)
ऋग्वेद (मंडल 7)
इ॒मा जुह्वा॑ना यु॒ष्मदा नमो॑भिः॒ प्रति॒ स्तोमं॑ सरस्वति जुषस्व । तव॒ शर्म॑न्प्रि॒यत॑मे॒ दधा॑ना॒ उप॑ स्थेयाम शर॒णं न वृ॒क्षम् ॥ (५)
हे सरस्वती! इस यज्ञ का हवन करते हुए हम लोग स्तुतियों द्वारा तुमसे धन प्राप्त करेंगे. तुम हमारी स्तुति स्वीकार करो. हम तुम्हारे सर्वाधिक प्रिय घर में रहते हुए तुम्हारे साथ इस प्रकार मिलेंगे, जिस प्रकार पक्षी अपने आश्रयस्थल वृक्ष से मिलते हैं. (५)
O Saraswati! While performing havan of this yajna, we will receive wealth from you through praises. You accept our praise. We will meet with you while we are in your most beloved house, just as birds meet their sheltered tree. (5)
ऋग्वेद (मंडल 7)
अ॒यमु॑ ते सरस्वति॒ वसि॑ष्ठो॒ द्वारा॑वृ॒तस्य॑ सुभगे॒ व्या॑वः । वर्ध॑ शुभ्रे स्तुव॒ते रा॑सि॒ वाजा॑न्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (६)
हे शोभनधन वाली सरस्वती! यह वसिष्ठ तुम्हारे लिए यज्ञ के द्वार खोलता है. हे उज्ज्वल वर्ण वाली सरस्वती देवी! तुम वृद्धि प्राप्त करो एवं स्तोता को अन्न दो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (६)
O Shobhandhan Wali Saraswati! This Vasishtha opens the doors of yajna for you. O goddess saraswati with bright colours! You get the growth and give the food to the hymn. Oh, God! You always follow us by means of well-being. (6)