ऋग्वेद (मंडल 8)
तस्येदर्व॑न्तो रंहयन्त आ॒शव॒स्तस्य॑ द्यु॒म्नित॑मं॒ यशः॑ । न तमंहो॑ दे॒वकृ॑तं॒ कुत॑श्च॒न न मर्त्य॑कृतं नशत् ॥ (६)
उसी के व्यापक अश्च वेगपूर्वक चलते हैं, उसी का यश सबसे अधिक दीप्त होता है और उसे वेदकृत या मनुष्यकृत कोई भी पाप नहीं लगता. (६)
His broad wonders move swiftly, his glory is the most luminous, and he does not find any sin sin, either vedic or man-made. (6)