हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
तं गू॑र्धया॒ स्व॑र्णरं दे॒वासो॑ दे॒वम॑र॒तिं द॑धन्विरे । दे॒व॒त्रा ह॒व्यमोहि॑रे ॥ (१)
हे स्तोताओ! सबके नेता प्रसिद्ध अग्नि की स्तुति करो. ऋत्विज्‌ सबके स्वामी अग्नि देव के समीप जाते हैं एवं देवों को हव्य देते हैं. (१)
This stotao! Praise the famous agni leader of all. The lord of all the ritwijs goes to the agni god and gives a greeting to the gods. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
विभू॑तरातिं विप्र चि॒त्रशो॑चिषम॒ग्निमी॑ळिष्व य॒न्तुर॑म् । अ॒स्य मेध॑स्य सो॒म्यस्य॑ सोभरे॒ प्रेम॑ध्व॒राय॒ पूर्व्य॑म् ॥ (२)
हे मेधावी सौभरि! अधिक देने वाले, विचित्र-दीप्तिसंपन्न इस सोमसाध्य यज्ञ के नियंता एवं पुरातन अग्नि की स्तुति यज्ञपूर्ति के लिए करो. (२)
O bright hundred! Praise the ancient agni and the controller of this more-giving, strange-glowing somasadhya yajna for the fulfillment of the yajna. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
यजि॑ष्ठं त्वा ववृमहे दे॒वं दे॑व॒त्रा होता॑र॒मम॑र्त्यम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ॥ (३)
हे अतिशय-यज्ञपात्र, देवों में सर्वोत्तम देवों को बुलाने वाले, मरणरहित एवं इस यज्ञ के शोभनकर्तता अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. (३)
O atishya-yajnapatra, who calls the best gods among the gods, without death and the beauty of this yajna agni! We call you. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
ऊ॒र्जो नपा॑तं सु॒भगं॑ सु॒दीदि॑तिम॒ग्निं श्रेष्ठ॑शोचिषम् । स नो॑ मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ सो अ॒पामा सु॒म्नं य॑क्षते दि॒वि ॥ (४)
अन्न का पालन करने वाले शोभन धनयुक्त, उत्तम दीप्तिसंपन्न एवं श्रेष्ठ प्रकाश वाले अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. वे हमारे लिए द्युलोक में मित्र एवं वरुण के सुख का विचार करके तथा जल देवता के सुख के लिए यज्ञ करें. (४)
I admire the agni that follows food, rich, with the best of bright and the best light. They should perform yajna for us in Douloka thinking of the happiness of friend and Varuna and for the happiness of the water god. (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
यः स॒मिधा॒ य आहु॑ती॒ यो वेदे॑न द॒दाश॒ मर्तो॑ अ॒ग्नये॑ । यो नम॑सा स्वध्व॒रः ॥ (५)
जो मनुष्य समिधा द्वारा, आहुतियों द्वारा, वेदाध्ययन द्वारा एवं सुंदर यज्ञ करते समय नमस्कार द्वारा अग्नि की सेवा करता है. (५)
A man who serves agni by samidha, by ahutis, by vedadhyayana and by salutation salutation while performing beautiful yajna. (5)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
तस्येदर्व॑न्तो रंहयन्त आ॒शव॒स्तस्य॑ द्यु॒म्नित॑मं॒ यशः॑ । न तमंहो॑ दे॒वकृ॑तं॒ कुत॑श्च॒न न मर्त्य॑कृतं नशत् ॥ (६)
उसी के व्यापक अश्च वेगपूर्वक चलते हैं, उसी का यश सबसे अधिक दीप्त होता है और उसे वेदकृत या मनुष्यकृत कोई भी पाप नहीं लगता. (६)
His broad wonders move swiftly, his glory is the most luminous, and he does not find any sin sin, either vedic or man-made. (6)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
स्व॒ग्नयो॑ वो अ॒ग्निभिः॒ स्याम॑ सूनो सहस ऊर्जां पते । सु॒वीर॒स्त्वम॑स्म॒युः ॥ (७)
हे बल के पुत्र एवं हव्य अन्नों के स्वामी अग्नि! हम तुम्हारे गार्हपत्यादि रूपों द्वारा शोभन अग्नि वाले बनेंगे. तुम शोभन वीरों वाले बनकर हमारी रक्षा करो. (७)
O son of strength and lord of the food grains of the good, Agni! We will become a agni-walled by your garhapatadi forms. You protect us by becoming the heroes. (7)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
प्र॒शंस॑मानो॒ अति॑थि॒र्न मि॒त्रियो॒ऽग्नी रथो॒ न वेद्यः॑ । त्वे क्षेमा॑सो॒ अपि॑ सन्ति सा॒धव॒स्त्वं राजा॑ रयी॒णाम् ॥ (८)
अग्नि प्रशंसा करते हुए अतिथि के समान स्तोताओं के हितैषी एवं रथ के समान इच्छित फल देने वाले हैं. हे अग्नि! तुम में उचित रक्षासाधन हैं एवं तुम धन के स्वामी हो. (८)
Agni is a benefactor of the guests and give the desired fruits like the chariot, while praising the agni. O agni! You have proper defense money and you are the master of wealth. (8)
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