ऋग्वेद (मंडल 8)
आ ग॑न्ता॒ मा रि॑षण्यत॒ प्रस्था॑वानो॒ माप॑ स्थाता समन्यवः । स्थि॒रा चि॑न्नमयिष्णवः ॥ (१)
हे प्रस्थान करने वाले मरुतो! आओ. तुम हमें मत मारना. तुम समानरूप से क्रोधित होने पर दृढ़ पर्वतों को भी कंपा सकते हो. तुम हमसे दूर मत रहो. (१)
O departing Maruto! Come. Don't you kill us. You can also tremble the firm mountains when you are equally angry. Don't stay away from us. (1)
ऋग्वेद (मंडल 8)
वी॒ळु॒प॒विभि॑र्मरुत ऋभुक्षण॒ आ रु॑द्रासः सुदी॒तिभिः॑ । इ॒षा नो॑ अ॒द्या ग॑ता पुरुस्पृहो य॒ज्ञमा सो॑भरी॒यवः॑ ॥ (२)
दीप्तिशाली निवासस्थान वाले एवं रुद्रपुत्र मरुतो! तुम ऐसे रथों द्वारा आओ, जिनके पहियों की नेमियां शोभन दीप्ति वाली हैं. हे बहुतों द्वारा अभिलषित मरुतो! मुझ सौभरि के प्रति मन में दयालु बनकर एवं अन्न लेकर आज यज्ञ में आओ. (२)
Maruto, the son of Rudra, with a glorious abode! You come by chariots whose wheels have a glorious glow. O Maruto, who is anointed by many! Be kind to me in my heart and bring food to me today. (2)
ऋग्वेद (मंडल 8)
वि॒द्मा हि रु॒द्रिया॑णां॒ शुष्म॑मु॒ग्रं म॒रुतां॒ शिमी॑वताम् । विष्णो॑रे॒षस्य॑ मी॒ळ्हुषा॑म् ॥ (३)
हम कर्म वाले एवं कृपाजल से सींचने वाले रुद्रपुत्र मरुतों एवं विष्णु के उग्रबल को जानते हैं. (३)
We know the virtuous power of the Rudraputra Maruts and Vishnu, who are karma-walas and watered with kripajal. (3)
ऋग्वेद (मंडल 8)
वि द्वी॒पानि॒ पाप॑त॒न्तिष्ठ॑द्दु॒च्छुनो॒भे यु॑जन्त॒ रोद॑सी । प्र धन्वा॑न्यैरत शुभ्रखादयो॒ यदेज॑थ स्वभानवः ॥ (४)
हे शोभन आयुधों वाले एवं विशिष्ट दीप्ति वाले मरुतो! तुम्हारे आने से जो कंपन होता है, उससे सारे द्वीप गिर पड़ते हैं, वृक्षादि स्थावर दु:खी होते हैं, द्यावा-पृथिवी दोनों कांप उठते हैं एवं गमनशील जल बहने लगता है. (४)
O maruto with beautiful ordnances and with a special radiance! The vibrations that occur when you come, all the islands fall, the trees are in real sorrow, both the dawa-earth tremble, and the moving water begins to flow. (4)
ऋग्वेद (मंडल 8)
अच्यु॑ता चिद्वो॒ अज्म॒न्ना नान॑दति॒ पर्व॑तासो॒ वन॒स्पतिः॑ । भूमि॒र्यामे॑षु रेजते ॥ (५)
हे मरुतो! जिस समय तुम युद्ध में जाते हो, उस समय अच्युत पर्वत एवं वनस्पतियां बार-बार शब्द करती हैं तथा धरती कांपती है. (५)
O Maruto! At the time you go to war, the Achyuta mountains and vegetation repeatedly make words and the earth trembles. (5)
ऋग्वेद (मंडल 8)
अमा॑य वो मरुतो॒ यात॑वे॒ द्यौर्जिही॑त॒ उत्त॑रा बृ॒हत् । यत्रा॒ नरो॒ देदि॑शते त॒नूष्वा त्वक्षां॑सि बा॒ह्वो॑जसः ॥ (६)
हे मरुतो! तुम्हारे बलपूर्वक गमन को स्थान देने के विचार से लोक विशाल अंतरिक्ष से ऊपर चला गया है. उस अंतरिक्ष में बहुशक्तिसंपन्न एवं नेता मरुद्गण अपने शरीरों में दीप्ति आभरण धारण करते हैं. (६)
O Maruto! The idea of giving space to your forcible movement has gone up from the vast space of the folk. In that space, the multi-powerful and the leader deserts hold a glow in their bodies. (6)
ऋग्वेद (मंडल 8)
स्व॒धामनु॒ श्रियं॒ नरो॒ महि॑ त्वे॒षा अम॑वन्तो॒ वृष॑प्सवः । वह॑न्ते॒ अह्रु॑तप्सवः ॥ (७)
नेता, दीप्त, शक्तिशाली, वर्षारूप एवं कुटिलतारहित मरुद्गण हव्य अन्न पाने के लिए महती शोभा धारण करते हैं. (७)
Leaders, bright, powerful, rainy-like and unruly deserters grace the great glory to get the food. (7)
ऋग्वेद (मंडल 8)
गोभि॑र्वा॒णो अ॑ज्यते॒ सोभ॑रीणां॒ रथे॒ कोशे॑ हिर॒ण्यये॑ । गोब॑न्धवः सुजा॒तास॑ इ॒षे भु॒जे म॒हान्तो॑ नः॒ स्पर॑से॒ नु ॥ (८)
सौभरि आदि ऋषियों की स्तुतियों से सोने के बने रथ के मध्यभाग में मरुतों की वीणा प्रकट हो रही हैं. गाएं जिनकी माता हैं, शोभन जन्म वाले एवं महानुभाव मरुद्गण हमारे अन्न, भोग एवं प्रसन्नता के लिए दयालु हों. (८)
The harps of the maruts are appearing in the middle part of the chariot made of gold from the praises of the sages like Saubhari etc. Sing those who have mothers, may the beautiful born and the great-willed deserts be kind to our food, enjoyment and happiness. (8)