ऋग्वेद (मंडल 8)
आ ना॒र्यस्य॒ दक्षि॑णा॒ व्य॑श्वाँ एतु सो॒मिनः॑ । स्थू॒रं च॒ राधः॑ श॒तव॑त्स॒हस्र॑वत् ॥ (२९)
मानव हितकारी एवं सोमरस वाले यजमान वरू की दक्षिणा व्यश्च एवं उसके पुत्रों को प्राप्त हो. हमारे पास सौ और हजारों की संख्या में स्थूल धन आवे. (२९)
The south of Varu, the host of man-benevolent and somras, may be received by the person and his sons. We have a hundred and thousands of gross wealth. (29)