ऋग्वेद (मंडल 8)
नकि॒ष्टं कर्म॑णा नश॒न्न प्र यो॑ष॒न्न यो॑षति । दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत् ॥ (१७)
जो यजमान देवों का मनचाहा यज्ञ करना चाहता है उसे अपने कर्म द्वारा कोई वश में नहीं कर सकता, उसे कोई स्थान से हटा नहीं सकता तथा वह पुत्रादि द्वारा रहित नहीं होता. देवों की मनचाही पूजा का अभिलाषी यज्ञ न करने वाले को हराता है. (१७)
The host who wants to perform the desired yajna of the gods cannot be subdued by his karma, no one can remove him from a place and is not devoid of sonhood. The desire to worship the gods defeats the one who does not perform the yajna. (17)