हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
यो यजा॑ति॒ यजा॑त॒ इत्सु॒नव॑च्च॒ पचा॑ति च । ब्र॒ह्मेदिन्द्र॑स्य चाकनत् ॥ (१)
जो यजमान यज्ञ करता है, देवों के लिए हव्य देता है, सोमरस निचोड़ता है एवं पुरोडाश पकाता है, वह इंद्र संबंधी मंत्रों को बार-बार बोलता है. (१)
The host who performs yajna, gives a havya for the gods, squeezes the somras and cooks the purodash, speaks the mantras of Indra again and again. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
पु॒रो॒ळाशं॒ यो अ॑स्मै॒ सोमं॒ रर॑त आ॒शिर॑म् । पादित्तं श॒क्रो अंह॑सः ॥ (२)
जो यजमान इंद्र को पुरोडाश एवं गाय के दूध से मिला सोमरस देता है, उसे इंद्र पाप से बचाते हैं, यह निश्चित है. (२)
The host who gives Indra a sorodash and somras mixed with cow's milk, it is certain that Indra saves him from sin. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
तस्य॑ द्यु॒माँ अ॑स॒द्रथो॑ दे॒वजू॑तः॒ स शू॑शुवत् । विश्वा॑ व॒न्वन्न॑मि॒त्रिया॑ ॥ (३)
देवों की पूजा करने वाले यजमान के पास देवों द्वारा भेजा हुआ तेजस्वी रथ आता है. यजमान उस रथ द्वारा शत्रुओं की समस्त बाधाओं को नष्ट करता हुआ समृद्ध होता है. (३)
The host who worships the gods comes to the magnificent chariot sent by the gods. The host prospers by destroying all the obstacles of the enemies by that chariot. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
अस्य॑ प्र॒जाव॑ती गृ॒हेऽस॑श्चन्ती दि॒वेदि॑वे । इळा॑ धेनु॒मती॑ दुहे ॥ (४)
इस यजमान के घर में संतानयुक्त, कहीं न जाने वाला एवं गायों सहित अन्न प्रतिदिन प्राप्त किया जाता है. (४)
In this host's house, food containing children, non-going and including cows is obtained every day. (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
या दम्प॑ती॒ सम॑नसा सुनु॒त आ च॒ धाव॑तः । देवा॑सो॒ नित्य॑या॒शिरा॑ ॥ (५)
हे देवो! जो पतिपत्नी समान विचार से सोमरस निचोड़ते हैं, उसे दशापवित्र द्वारा शुद्ध करते हैं एवं तीसरे सवन में उस में गोदुग्ध मिलाते हैं. (५)
Oh, God! The husbands and wives who squeeze the somras with the same thought, purify it with dashapavittra and add godhudha to it in the third suvan. (5)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
प्रति॑ प्राश॒व्या॑ँ इतः स॒म्यञ्चा॑ ब॒र्हिरा॑शाते । न ता वाजे॑षु वायतः ॥ (६)
वे भोजन के योग्य अन्न देवों से प्राप्त करते हैं, मिलकर यज्ञ के कुशों पर बैठते हैं एवं किसी के पास अन्न मांगने नहीं जाते. (६)
They get food from the gods, sit together on the kushas of yajna and do not go to anyone to ask for food. (6)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
न दे॒वाना॒मपि॑ ह्नुतः सुम॒तिं न जु॑गुक्षतः । श्रवो॑ बृ॒हद्वि॑वासतः ॥ (७)
हे देवो! वे पतिपत्नी देवों के प्रति बुरी बातें नहीं करते एवं तुम्हारे प्रति शोभन बुद्धि को समाप्त करना नहीं चाहते. वे अधिक अन्न द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (७)
Oh Devas! They do not speak bad things towards the deities, husband and wife and do not want to end their intellect towards you. They serve you with more food. (7)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
पु॒त्रिणा॒ ता कु॑मा॒रिणा॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुतः । उ॒भा हिर॑ण्यपेशसा ॥ (८)
वे शिशुओं एवं कुमारों वाले पतिपत्नी सोने के गहनों से युक्त होकर पूर्ण आयु प्राप्त करते हैं. (८)
Those husbands and wives with babies and virgins attain full life by being adorned with gold ornaments. (8)
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