ऋग्वेद (मंडल 8)
ज॒नि॒ता दि॒वो ज॑नि॒ता पृ॑थि॒व्याः पिबा॒ सोमं॒ मदा॑य॒ कं श॑तक्रतो । यं ते॑ भा॒गमधा॑रय॒न्विश्वाः॑ सेहा॒नः पृत॑ना उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वा॑ँ इन्द्र सत्पते ॥ (४)
हे इंद्र! तुम द्युलोक एवं धरती के जनक हो. हे सज्जनपालक तथा बहुकर्म वाले इंद्र! देवों द्वारा सोमरस के अपने निश्चित भाग को तुम समस्त शत्रुओं एवं वेगों को पराजित करके तथा जल के बीच विजयी बनकर पिओ. (४)
O Indra! You are the father of the world and the earth. O gentleman and multi-worked Indra! Drink your certain portion of the Somras by the gods by defeating all the enemies and velocities and victorious among the waters. (4)