हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.41.10

मंडल 8 → सूक्त 41 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
यः श्वे॒ताँ अधि॑निर्णिजश्च॒क्रे कृ॒ष्णाँ अनु॑ व्र॒ता । स धाम॑ पू॒र्व्यं म॑मे॒ यः स्क॒म्भेन॒ वि रोद॑सी अ॒जो न द्यामधा॑रय॒न्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥ (१०)
जो वरुण अपनी किरणों को दिन में श्वेत एवं रात में काली बना देते हैं, उन्होंने अपने कर्मो के उद्देश्यों से ह्युलोक, अंतरिक्ष एवं धरती को बनाया है. सूर्य जिस प्रकार द्युलोक को धारण करते हैं, उसी प्रकार वरुण अंतरिक्ष के द्वारा द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं. वरुण सभी शत्रुओं को मारें. (१०)
Varuna, who makes his rays white in the day and black at night, have created the halo, space and the earth for the purposes of his deeds. Just as the Sun holds the Dulok, varuna holds the dyava-prithvivi through space. Varun kills all the enemies. (10)