ऋग्वेद (मंडल 8)
तमी॑ळिष्व॒ य आहु॑तो॒ऽग्निर्वि॒भ्राज॑ते घृ॒तैः । इ॒मं नः॑ शृणव॒द्धव॑म् ॥ (२२)
घृत के साथ आहुतियां पाकर विराजमान एवं हमारे इस आह्वान को सुनने वाले अग्नि की स्तुति करो. (२२)
Sit with the awfulness and praise the agni that listens to this call of ours. (22)