ऋग्वेद (मंडल 8)
स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम् । आस्मि॑न्ह॒व्या जु॑होतन ॥ (१)
हे ऋत्विजो! अतिथि के समान प्रिय अग्नि की समिधा द्वारा सेवा करो, उन्हें घृत द्वारा जगाओ. प्रज्वलित अग्नि में हव्यों का हवन करो. (१)
Hey Ritvijo! Serve by the treaty of agni as dear as the guest, wake them up by the awfulness. Perform havan of the havans in the ignited agni. (1)
ऋग्वेद (मंडल 8)
अग्ने॒ स्तोमं॑ जुषस्व मे॒ वर्ध॑स्वा॒नेन॒ मन्म॑ना । प्रति॑ सू॒क्तानि॑ हर्य नः ॥ (२)
हे अग्नि! तुम मेरे स्तुति मंत्रों को स्वीकार करो, इस मनोहर स्तोत्र द्वारा बढ़ो एवं हमारे सूक्तों की कामना करो. (२)
O agni! You accept my praise mantras, grow by this beautiful hymn and wish for our suktas. (2)
ऋग्वेद (मंडल 8)
अ॒ग्निं दू॒तं पु॒रो द॑धे हव्य॒वाह॒मुप॑ ब्रुवे । दे॒वाँ आ सा॑दयादि॒ह ॥ (३)
मैं देवों के दूत एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि को अपने सामने स्थापित करता हूं तथा उनकी स्तुति करता हूं. वे इस यज्ञ में देवों को बैठावें. (३)
I set before me the angels of the gods and the agni that carries the wind and praise them. Let them sit the gods in this yajna. (3)
ऋग्वेद (मंडल 8)
उत्ते॑ बृ॒हन्तो॑ अ॒र्चयः॑ समिधा॒नस्य॑ दीदिवः । अग्ने॑ शु॒क्रास॑ ईरते ॥ (४)
हे दीप्तिशाली अग्नि! जब तुम प्रज्वलित होते हो, तब तुम्हारी बढ़ी हुई एवं ज्वलंत किरणें ऊपर उठती हैं. (४)
O glorious agni! When you are ignited, your enlarged and vivid rays rise. (4)
ऋग्वेद (मंडल 8)
उप॑ त्वा जु॒ह्वो॒३॒॑ मम॑ घृ॒ताची॑र्यन्तु हर्यत । अग्ने॑ ह॒व्या जु॑षस्व नः ॥ (५)
हे अभिलाषा करने वाले अग्नि! मेरा घृत धारण करने वाला खुच तुम्हारे पास जावे. तुम हमारे हव्यों को स्वीकार करो. (५)
O agni that desires! Let the one who wears my disgust go to you. You accept our words. (5)
ऋग्वेद (मंडल 8)
म॒न्द्रं होता॑रमृ॒त्विजं॑ चि॒त्रभा॑नुं वि॒भाव॑सुम् । अ॒ग्निमी॑ळे॒ स उ॑ श्रवत् ॥ (६)
मैं प्रसन्न, देवों को बुलाने वाले, ऋत्विज्, विचित्र प्रकाश वाले एवं दीप्तिरूपी धन से युक्त अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि मेरी स्तुति सुनें. (६)
I praise the agni of delight, the one who calls the gods, the ritwij, the strange light, and the radiant wealth. Fire listen to my praise. (6)
ऋग्वेद (मंडल 8)
प्र॒त्नं होता॑र॒मीड्यं॒ जुष्ट॑म॒ग्निं क॒विक्र॑तुम् । अ॒ध्व॒राणा॑मभि॒श्रिय॑म् ॥ (७)
मैं प्राचीन, देवों को बुलाने वाले, स्तुतियोग्य, सेवित, कार्य पूर्ण करने वाले एवं यज्ञों का आश्रय लेने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (७)
I praise the ancient agni, the one who calls the gods, the praiseworthy, the serviced, the one who completes the work and who takes shelter in the yagnas. (7)
ऋग्वेद (मंडल 8)
जु॒षा॒णो अ॑ङ्गिरस्तमे॒मा ह॒व्यान्या॑नु॒षक् । अग्ने॑ य॒ज्ञं न॑य ऋतु॒था ॥ (८)
हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम क्रम से हमारे हव्यों का सेवन करो एवं हमारे यज्ञों को तऋतुओं के अनुसार पूर्ण करो. (८)
O the great agni in the Angiras! You consume our vows in order and complete our yajnas according to the seasons. (8)