ऋग्वेद (मंडल 8)
यो अ॒ग्निं त॒न्वो॒३॒॑ दमे॑ दे॒वं मर्तः॑ सप॒र्यति॑ । तस्मा॒ इद्दी॑दय॒द्वसु॑ ॥ (१५)
जो मनुष्य धनप्राप्ति के लिए अपने घर में अग्नि की सेवा करता है, अग्नि उसीको धन देते हैं. (१५)
The man who serves agni in his house for the sake of wealth, the agni gives him wealth. (15)