हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.44.18

मंडल 8 → सूक्त 44 → श्लोक 18 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
ईशि॑षे॒ वार्य॑स्य॒ हि दा॒त्रस्या॑ग्ने॒ स्व॑र्पतिः । स्तो॒ता स्यां॒ तव॒ शर्म॑णि ॥ (१८)
हे स्वर्ग के पति अग्नि! तुम वरणीय एवं देने योग्य धन के स्वामी हो. मैं सुख के निमित्त तुम्हारा स्तोता बनूं. (१८)
O heaven's husband, Fire! You are the master of selectable and giveable wealth. I will be your hymn for the sake of happiness. (18)