ऋग्वेद (मंडल 8)
अग्ने॑ धृ॒तव्र॑ताय ते समु॒द्राये॑व॒ सिन्ध॑वः । गिरो॑ वा॒श्रास॑ ईरते ॥ (२५)
हे यज्ञकर्म धारण करने वाले अग्नि! मेरी स्तुतियां तुम्हारे समीप उसी प्रकार पहुंचती हैं, जिस प्रकार नदियां समुद्र के पास जाती हैं. (२५)
O agni that performs yajnakarma! My praises come to you in the same way that rivers approach the sea. (25)