हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.44.25

मंडल 8 → सूक्त 44 → श्लोक 25 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
अग्ने॑ धृ॒तव्र॑ताय ते समु॒द्राये॑व॒ सिन्ध॑वः । गिरो॑ वा॒श्रास॑ ईरते ॥ (२५)
हे यज्ञकर्म धारण करने वाले अग्नि! मेरी स्तुतियां तुम्हारे समीप उसी प्रकार पहुंचती हैं, जिस प्रकार नदियां समुद्र के पास जाती हैं. (२५)
O agni that performs yajnakarma! My praises come to you in the same way that rivers approach the sea. (25)