ऋग्वेद (मंडल 8)
धीरो॒ ह्यस्य॑द्म॒सद्विप्रो॒ न जागृ॑विः॒ सदा॑ । अग्ने॑ दी॒दय॑सि॒ द्यवि॑ ॥ (२९)
हे अग्नि! तुम धीर, हवि में स्थित रहने वाले एवं मेधावी के समान प्रजाओं के हित में सदा जागृत रहते हो एवं सदा अंतरिक्ष में दीप्त रहते हो. (२९)
O agni! You are always awake in the interest of the people who live in patience, who live in Havi and are always bright in space. (29)