हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.48.12

मंडल 8 → सूक्त 48 → श्लोक 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 48
यो न॒ इन्दुः॑ पितरो हृ॒त्सु पी॒तोऽम॑र्त्यो॒ मर्त्या॑ँ आवि॒वेश॑ । तस्मै॒ सोमा॑य ह॒विषा॑ विधेम मृळी॒के अ॑स्य सुम॒तौ स्या॑म ॥ (१२)
हे पितरो! जो मरणरहित सोम पिए जाने पर हम मानवों के हृदय में प्रविष्ट हुआ है, हम हव्यधारणकर्ता यजमान उसी सोम की सेवा करेंगे एवं उसकी कृपा दृष्टि में रहेंगे. (१२)
O Pitro! The mortal undeserved monism that has entered the hearts of us human beings when we drink the undeterred som, we will serve the same Som and his grace will be in sight. (12)