हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.56.18

मंडल 8 → सूक्त 56 → श्लोक 18 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 56
तत्सु नो॒ नव्यं॒ सन्य॑स॒ आदि॑त्या॒ यन्मुमो॑चति । ब॒न्धाद्ब॒द्धमि॑वादिते ॥ (१८)
हे अदिति एवं आदित्यो! वह प्रशंसनीय जाल हमें छोड़ने के कारण सेवायोग्य बने जो तुम्हारी कृपा से हमें छोड़ता है. जैसे बंधन बंधे हुए पुरुष को छोड़ा है, उसी प्रकार यह जाल हमें छोड़ता है. (१८)
O Aditi and Aditya! He became serviceable because of leaving us the admirable trap which forsakes us by Your grace. Just as the bond is left to the bound man, so this trap leaves us. (18)