ऋग्वेद (मंडल 8)
प्र यद्वस्त्रष्टुभमिषं मरुतो विप्रो अक्षरत्, वि पर्वतेषु राजथ.. (१)
हे मरुतो! जब विद्वान् ब्राहमण तीनों सवनों में प्रशंसनीय अन्न डालते हैं, तब तुम पर्वतो में प्रकाशित होते हो. (१)
O Maruto! When the learned Brahmins pour praiseworthy food into the three sawas, you are illuminated in the mountains. (1)
ऋग्वेद (मंडल 8)
यदङ्ग तविषीयवो यामं शुभ्रा अचिध्वम्, नि पर्वता अहासत.. (२)
हे शक्ति के इच्छुक एवं शोभन मरुतो! जब तुम रथ में घोड़े जोड़ते हो, तब तुम्हारे भय से पर्वत भी कांप जाते हैं. (२)
O godly and desirous of power, Maruto! When you add horses to the chariot, the mountains tremble with your fear. (2)
ऋग्वेद (मंडल 8)
उदीरयन्त वायुभिर्वाश्रासः पृश्चिमातरः. धुक्षन्त पिप्युषीमिषम्,. (३)
शब्द करने वाले एवं पृश्नि के पुत्र मरुद्गण हवाओं द्वारा बादलों को ऊपर उठाते हैं एवं बुद्धि बढ़ाने वाला अन्न दान करते हैं. (३)
The marudgans, the words and the sons of the earth, raise the clouds up by the winds and donate the food that increases the intellect. (3)
ऋग्वेद (मंडल 8)
वपन्ति मरुतो मिहं प्र वेपयन्ति पर्वतान्, यद्यामं यान्ति वायुभिः.. (४)
मरुद्गण जब हवाओं के साथ चलते हैं, तब वर्षा को बिखेरते हैं एवं पहाड़ों को कंपित करते हैं. (४)
When deserts move with the winds, they scatter the rain and make the mountains tremble. (4)
ऋग्वेद (मंडल 8)
नि यद्यामाय वो गिरिर्नि सिन्धवो विधर्मणे. महे शुष्माय येमिरे. (५)
हे मरुतो! तुम्हारे रथ के गमन के लिए पर्वतों का मार्ग नियत है. नदियां रक्षा एवं महान् बल पाने के लिए निश्चित मार्ग वाली हैं. (५)
O Maruto! The path to the mountains is destined for the movement of your chariot. Rivers are the surest way to get protection and strength. (5)
ऋग्वेद (मंडल 8)
युष्माँ उ नक्तमूतये युष्मान्दिवा हवामहे. युष्मान्प्रयत्यध्वरे.. (६)
हे मरुतो! हम तुम्हें अपनी रक्षा के लिए रात में, दिन में एवं यज्ञ के आरंभ में बुलाते हैं. (६)
O Maruto! We call you at night, in the day and at the beginning of the yagna to protect you. (6)
ऋग्वेद (मंडल 8)
उदु त्ये अरुणप्सवश्चित्रा यामेभिरीरते. वाश्रा अधि ष्णुना दिवः.. (७)
वे ही लाल रंग वाले, विचित्र एवं शब्द करने वाले मरुद्गण अपने रथ द्वारा झुलोक के ऊंचे भाग से आते हैं. (७)
They are the red-colored, strange and word-making deserts who come from the high part of the jhuloka by their chariots. (7)
ऋग्वेद (मंडल 8)
सृजन्ति रश्मिमोजसा पन्थां सूर्याय यातवे. ते भानुभिर्वि तस्थिरे.. (८)
जो मरुद्गण सूर्य के चलने के लिए किरणरूपी मार्ग बनाते हैं, वे अपने तेजों द्वारा स्थित रहते हैं. (८)
The deserts who form the ray-like path for the sun to walk are located by their brightness. (8)