ऋग्वेद (मंडल 8)
ओ षु वृष्णः प्रयज्यूना नव्यसे सुविताय. ववृत्यां चित्रावाजान्.. (३३)
मैं अभिलाषापूरक, विशिष्ट रूप से यज्ञपात्र व विचित्र गति वाले मरुतों को भली प्रकार प्राप्त होने वाले नवीन धन के लिए दयालु बनाता हूं. (३३)
I make the desireful, especially the sacrificial, and the strange-moving maruts kind to the new wealth that is well received. (33)