हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.7.33

मंडल 8 → सूक्त 7 → श्लोक 33 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 7
ओ षु वृष्णः प्रयज्यूना नव्यसे सुविताय. ववृत्यां चित्रावाजान्‌.. (३३)
मैं अभिलाषापूरक, विशिष्ट रूप से यज्ञपात्र व विचित्र गति वाले मरुतों को भली प्रकार प्राप्त होने वाले नवीन धन के लिए दयालु बनाता हूं. (३३)
I make the desireful, especially the sacrificial, and the strange-moving maruts kind to the new wealth that is well received. (33)