हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
प्रेष्ठं॑ वो॒ अति॑थिं स्तु॒षे मि॒त्रमि॑व प्रि॒यम् । अ॒ग्निं रथं॒ न वेद्य॑म् ॥ (१)
हे यजमानो! मैं तुम्हारे प्रियतम, अतिथि तथा रथ के समान धनवाहक अग्नि की स्तुति करता हूं. (१)
O hosts! I praise your beloved, the guest and the rich agni like a chariot. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
क॒विमि॑व॒ प्रचे॑तसं॒ यं दे॒वासो॒ अध॑ द्वि॒ता । नि मर्त्ये॑ष्वाद॒धुः ॥ (२)
इंद्र आदि देवों ने मनुष्यों में जिस अग्नि को दो रूप से स्थापित किया है एवं जो प्रकृष्ट ज्ञानी पुरुष के समान हैं, उन अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. (२)
I praise the agni which Indra and the gods have established in humans in two ways and who are like a wise man. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
त्वं य॑विष्ठ दा॒शुषो॒ नॄँः पा॑हि श‍ृणु॒धी गिरः॑ । रक्षा॑ तो॒कमु॒त त्मना॑ ॥ (३)
हे अतिशय युवा अग्नि! तुम हव्य देने वाले यजमानों का पालन करो. हमारी स्तुतियां सुनो और स्वयं ही हमारी संतान की रक्षा करो. (३)
O very young agni! You follow the hosts who give the greetings. Listen to our praises and protect our children yourself. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
कया॑ ते अग्ने अङ्गिर॒ ऊर्जो॑ नपा॒दुप॑स्तुतिम् । वरा॑य देव म॒न्यवे॑ ॥ (४)
हे सर्वत्र गतिशील एवं शक्ति के पुत्र अग्नि! तुम सबके वरण करने योग्य एवं शत्रुओं का अपमान करने वाले हो. मैं किस स्तोत्र द्वारा तुम्हारी स्तुति करूं. (४)
O Fire, son of motion and power everywhere! You are all worthy of choice and insulting your enemies. With which psalm should I praise you? (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
दाशे॑म॒ कस्य॒ मन॑सा य॒ज्ञस्य॑ सहसो यहो । कदु॑ वोच इ॒दं नमः॑ ॥ (५)
हे बल के पुत्र अग्नि! हम किस प्रकार यजमान के मन के अनुकूल हव्य तुम्हें दें? मैं यह नमस्कार कब बोलूं? (५)
O son of strength, agni! How can we give you the greetings that suit the host's mind? When do I say this greeting? (5)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
अधा॒ त्वं हि न॒स्करो॒ विश्वा॑ अ॒स्मभ्यं॑ सुक्षि॒तीः । वाज॑द्रविणसो॒ गिरः॑ ॥ (६)
हे अग्नि! तुम ही हमारी स्तुतियां सुनकर हमें उत्तम धन, घर एवं अन्न प्रदान करो. (६)
O agni! You are the ones who hear our praises and give us the best wealth, house and food. (6)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
कस्य॑ नू॒नं परी॑णसो॒ धियो॑ जिन्वसि दम्पते । गोषा॑ता॒ यस्य॑ ते॒ गिरः॑ ॥ (७)
हे गार्हपत्य अग्नि! तुम इस समय किसके विचित्र यज्ञकर्मो से प्रसन्न होते हो? तुम्हारी स्तुतियां गायों का लाभ कराने वाली होती हैं. (७)
O garhapatya agni! Whose strange sacrifices do you rejoice at this time? Your praises are beneficial to the cows. (7)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
तं म॑र्जयन्त सु॒क्रतुं॑ पुरो॒यावा॑नमा॒जिषु॑ । स्वेषु॒ क्षये॑षु वा॒जिन॑म् ॥ (८)
यजमान अपनी यज्ञशालाओं में शोभन बुद्धि वाले, युद्धों में आगे चलने वाले एवं शक्तिशाली अग्नि की पूजा करते हैं. (८)
Hosts worship in their yajnashalas a brave intellect, ahead of wars and a powerful agni. (8)
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