हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
उ॒भा हि द॒स्रा भि॒षजा॑ मयो॒भुवो॒भा दक्ष॑स्य॒ वच॑सो बभू॒वथुः॑ । ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम् ॥ (१)
हे दर्शनीय देवों के वैद्य एवं सुख देने वाले अश्चिनीकुमारो! तुम लोग दक्ष द्वारा की गई उपस्थिति के समय उपस्थित थे. मैं विश्वक नामक ऋषि तुम्हें संतानप्राप्ति के उद्देश्य से बुलाता हूं. हम ऋषियों और स्तोताओं की मित्रता मत तोड़ना. तुम अपने घोड़े यहां आकर रथ से अलग करो. (१)
O physician of the visible gods and the aschinikumaro who gives happiness! You were present at the time of the appearance made by Daksha. I call you a sage called Vishwak for the purpose of getting children. We don't break the friendship of sages and hymns. You come here and separate your horses from the chariot. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
क॒था नू॒नं वां॒ विम॑ना॒ उप॑ स्तवद्यु॒वं धियं॑ ददथु॒र्वस्य॑‍इष्टये । ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम् ॥ (२)
हे अश्विनीकुमारो! विमना नामक ऋषि ने किस प्रकार तुम्हारी स्तुति की थी, कि तुमने उसे धन देने के लिए अपने मन में निश्चय किया? उसी प्रकार मैं विश्वक ऋषि तुम्हें बुलाता हूं. हमारी मित्रता न छूटे. यहां आकर तुम अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (२)
O Ashwinikumaro! How did the sage named Vimana praise you, that you decided in your heart to give him money? In the same way, I call you the sage of The World. Don't miss our friendship. Come here and separate the reins of your horses. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
यु॒वं हि ष्मा॑ पुरुभुजे॒ममे॑ध॒तुं वि॑ष्णा॒प्वे॑ द॒दथु॒र्वस्य॑‍इष्टये । ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम् ॥ (३)
हे बहुतों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो! मेरे पुत्र विष्णायु को धन देने की इच्छा से तुमने धन दिया था. मैं अश्वक ऋषि संतान पाने के उद्देश्य से तुम्हें बुलाता हूं. हमारी मित्रता नष्ट मत करना. तुम यहां आकर अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (३)
O ashwinikumaro who follows many! You gave money to my son Vishnuyu with the desire to give money. I call you with the aim of getting the offspring of sage Ashwaka. Don't destroy our friendship. You come here and separate the reins of your horses. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
उ॒त त्यं वी॒रं ध॑न॒सामृ॑जी॒षिणं॑ दू॒रे चि॒त्सन्त॒मव॑से हवामहे । यस्य॒ स्वादि॑ष्ठा सुम॒तिः पि॒तुर्य॑था॒ मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम् ॥ (४)
हे अश्विनीकुमारो! हम वीर, धन का उपभोग करने वाले, ऋजीश युक्त एवं दूरस्थित विष्णायु को बुलाते हैं. उसकी स्तुति भी मुझ पिता के समान ही सरस है. हमारी मित्रता को अलग मत करो. तुम यहां आकर अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (४)
O Ashwinikumaro! We call veer, wealth-consuming, rijish-rich and remoted vishnuyu. His praise is just as simple as my father's. Don't separate our friendship. You come here and separate the reins of your horses. (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
ऋ॒तेन॑ दे॒वः स॑वि॒ता श॑मायत ऋ॒तस्य॒ श‍ृङ्ग॑मुर्वि॒या वि प॑प्रथे । ऋ॒तं सा॑साह॒ महि॑ चित्पृतन्य॒तो मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम् ॥ (५)
हे अश्विनीकुमारो! सत्य के द्वारा सूर्य अपनी किरणें शांत करते हैं. उसके बाद वे सत्य के सींग के समान अपनी किरणों का विस्तार करते हैं. सूर्य युद्ध करने वाले शत्रुओं को वास्तव में पराजित करते हैं. हमारी मित्रता अलग न हो. तुम यहां आकर अपने घोड़ो की लगाम अलग करो. (५)
O Ashwinikumaro! By truth, the sun calms its rays. After that they expand their rays like the horn of truth. The sun actually defeats the enemies who make war. Let our friendship be no different. You come here and separate the reins of your horses. (5)