हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.77.5

मंडल 8 → सूक्त 77 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
प्र हि रि॑रि॒क्ष ओज॑सा दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑ । न त्वा॑ विव्याच॒ रज॑ इन्द्र॒ पार्थि॑व॒मनु॑ स्व॒धां व॑वक्षिथ ॥ (५)
हे इंद्र! तुम अपने बल द्वारा ह्युलोक से भी महान्‌ बनते हो. मृत्युलोक तुम्हें व्याप्त नहीं कर पाता. तुम हमारा हव्य-अन्न वहन करने की इच्छा करो. (५)
O Indra! You become greater than Hueloka by your own force. The land of death cannot permeate you. You wish to bear our food. (5)