हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
तं वो॑ द॒स्ममृ॑ती॒षहं॒ वसो॑र्मन्दा॒नमन्ध॑सः । अ॒भि व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नव॒ इन्द्रं॑ गी॒र्भिर्न॑वामहे ॥ (१)
हम दर्शनीय, शत्रुओं को पराजित करने वाले, निवासस्थान देने वाले एवं सोमरस पीकर प्रसन्न बने हुए इंद्र को स्तुतियों द्वारा इस प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार गाएं गोशाला में इंद्र को बुलाती हैं. (१)
We call Indra, who is visible, defeats enemies, gives residence and is happy by drinking someras, in such a way that cows call Indra in the gaushala. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
द्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम् । क्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॑ म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥ (२)
हम दीप्तिशाली, शोभन-दान वाले, बलों से युक्त तथा पर्वत के समान अनेक लोगों का पालन करने वाले, इंद्र से बोलने वाले पुत्र-पौत्र, हजारों एवं सैकड़ों धनों से युक्त गाएं एवं अन्न शीघ्र मांगते हैं. (२)
We ask for beautiful, beautiful, armed and mountain-like people, sons and grandsons who speak to Indra, with thousands and hundreds of riches and ask for food soon. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
न त्वा॑ बृ॒हन्तो॒ अद्र॑यो॒ वर॑न्त इन्द्र वी॒ळवः॑ । यद्दित्स॑सि स्तुव॒ते माव॑ते॒ वसु॒ नकि॒ष्टदा मि॑नाति ते ॥ (३)
हे इंद्र! विशाल एवं दृढ़ पर्वत भी तुम्हें नहीं रोक पाते. मुझ जैसे स्तोता को तुम जो धन देना चाहते हो, तुम्हें उससे कोई नहीं रोक सकता. (३)
O Indra! Even the vast and strong mountains can't stop you. No one can stop you from the money you want to give to a parrot like me. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
योद्धा॑सि॒ क्रत्वा॒ शव॑सो॒त दं॒सना॒ विश्वा॑ जा॒ताभि म॒ज्मना॑ । आ त्वा॒यम॒र्क ऊ॒तये॑ ववर्तति॒ यं गोत॑मा॒ अजी॑जनन् ॥ (४)
हे इंद्र! ज्ञान एवं बल के द्वारा तुम शत्रु का संहार करते हो. तुम अपने कर्म एवं बल से सभी प्राणियों को हराते हो. तुम्हारी पूजा करने वाला यह स्तोता अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हारी सेवा में लगता है. गौतम वंश के ऋषियों ने तुम्हें अपने यज्ञ में प्रकट किया है. (४)
O Indra! By knowledge and force you destroy the enemy. You defeat all beings by your karma and force. This hymn that worships you is in your service for the sake of protecting you. The sages of the Gautama dynasty have revealed you in their yajna. (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
प्र हि रि॑रि॒क्ष ओज॑सा दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑ । न त्वा॑ विव्याच॒ रज॑ इन्द्र॒ पार्थि॑व॒मनु॑ स्व॒धां व॑वक्षिथ ॥ (५)
हे इंद्र! तुम अपने बल द्वारा ह्युलोक से भी महान्‌ बनते हो. मृत्युलोक तुम्हें व्याप्त नहीं कर पाता. तुम हमारा हव्य-अन्न वहन करने की इच्छा करो. (५)
O Indra! You become greater than Hueloka by your own force. The land of death cannot permeate you. You wish to bear our food. (5)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
नकिः॒ परि॑ष्टिर्मघवन्म॒घस्य॑ ते॒ यद्दा॒शुषे॑ दश॒स्यसि॑ । अ॒स्माकं॑ बोध्यु॒चथ॑स्य चोदि॒ता मंहि॑ष्ठो॒ वाज॑सातये ॥ (६)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान को जो धन देते हो, उससे तुम्हें कोई नहीं रोक पाता. तुम अतिशय दानशील एवं धन के प्रेरक बनकर मुझ उचथ्य ऋषि का स्तोत्र सुनो. (६)
O Dhanaswami Indra! No one can stop you from the money you give to the havyagar host. Listen to me the hymn of the sage High, being very charitable and inspiring of wealth. (6)