ऋग्वेद (मंडल 8)
त्वामिद्धि त्वा॒यवो॑ऽनु॒नोनु॑वत॒श्चरा॑न् । सखा॑य इन्द्र का॒रवः॑ ॥ (३३)
हे इंद्र! तुम्हारी अभिलाषा एवं बार-बार स्तुति करने वाले तुम्हारे मित्र स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (३३)
O Indra! Your desires and your friends who praise you again and again serve you with stota praises. (33)