हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.81.33

मंडल 8 → सूक्त 81 → श्लोक 33 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 81
त्वामिद्धि त्वा॒यवो॑ऽनु॒नोनु॑वत॒श्चरा॑न् । सखा॑य इन्द्र का॒रवः॑ ॥ (३३)
हे इंद्र! तुम्हारी अभिलाषा एवं बार-बार स्तुति करने वाले तुम्हारे मित्र स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (३३)
O Indra! Your desires and your friends who praise you again and again serve you with stota praises. (33)