हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.89.10

मंडल 8 → सूक्त 89 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 89
यद्वाग्वद॑न्त्यविचेत॒नानि॒ राष्ट्री॑ दे॒वानां॑ निष॒साद॑ म॒न्द्रा । चत॑स्र॒ ऊर्जं॑ दुदुहे॒ पयां॑सि॒ क्व॑ स्विदस्याः पर॒मं ज॑गाम ॥ (१०)
देवों को प्रसन्न करने वाली तेजपूर्ण वाणी न जाने हुए अर्थो को प्रकट करती हुई जिस समय यज्ञ में स्थित होती है, उस समय चारों दिशाएं इसके लिए अन्न और जल दुहती हैं. पता नहीं इसका श्रेष्ठ धन कहां जाता है? (१०)
The bright voice that pleases the gods reveals the meaning of the unnoticed meaning, at the time when it is located in the yajna, all the four directions milk food and water for it. I don't know where the best money goes? (10)