हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 103
प्र पु॑ना॒नाय॑ वे॒धसे॒ सोमा॑य॒ वच॒ उद्य॑तम् । भृ॒तिं न भ॑रा म॒तिभि॒र्जुजो॑षते ॥ (१)
हे त्रित ऋषि! तुम दशापवित्र द्वारा शुद्ध होते हुए, यज्ञविधाता एवं स्तुतियों द्वारा प्रसन्न सोम के प्रति उसी प्रकार तत्परता से वचन कहो, जिस प्रकार नौकर अपना वेतन मांगता है. (१)
O sage of Trita! You, being purified by dashapavittra, swear to Som, pleased with yajnavidhata and praises, in the same way as the servant asks for his salary. (1)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 103
परि॒ वारा॑ण्य॒व्यया॒ गोभि॑रञ्जा॒नो अ॑र्षति । त्री ष॒धस्था॑ पुना॒नः कृ॑णुते॒ हरिः॑ ॥ (२)
गाय के दूध में मिले हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हैं. हरे रंग वाले सोम शुद्ध होकर तीन स्थानों को अपना बनाते हैं. (२)
Mon mixed in cow's milk goes to Dashapavitra made of sheep's hair. The green-colored mons become pure and make three places their own. (2)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 103
परि॒ कोशं॑ मधु॒श्चुत॑म॒व्यये॒ वारे॑ अर्षति । अ॒भि वाणी॒रृषी॑णां स॒प्त नू॑षत ॥ (३)
सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र द्वारा अपना रस द्रोणकलश में भेजते हैं. ऋषियों के सात छंद सोम की स्तुति करते हैं. (३)
Mon sends his juice to Dronakalash by dashapavittra made of sheep's hair. The seven verses of the sages praise The Mon. (3)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 103
परि॑ णे॒ता म॑ती॒नां वि॒श्वदे॑वो॒ अदा॑भ्यः । सोमः॑ पुना॒नश्च॒म्वो॑र्विश॒द्धरिः॑ ॥ (४)
स्तुतियों के नेता, सबके देव, अहिंसित एवं हरे रंग के सोम रस निचोड़ने वाले तख्तों पर बैठते हैं. (४)
The leaders of the praises, the gods of all, sit on the planks squeezing non-violent and green mon rasa. (4)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 103
परि॒ दैवी॒रनु॑ स्व॒धा इन्द्रे॑ण याहि स॒रथ॑म् । पु॒ना॒नो वा॒घद्वा॒घद्भि॒रम॑र्त्यः ॥ (५)
हे सोम! तुम इंद्र के साथ एक ही रथ पर बैठकर देवों की सेना के पास जाओ. शुद्ध होते हुए, मरणरहित एवं ऋत्विजों द्वारा ढोये जाते हुए सोम स्तोताओं को धन देते हैं. (५)
Hey Mon! You sit on the same chariot with Indra and go to the army of gods. Being pure, undeterred and carried by the debtors, the Mons give money to the stotas. (5)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 103
परि॒ सप्ति॒र्न वा॑ज॒युर्दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ सु॒तः । व्या॒न॒शिः पव॑मानो॒ वि धा॑वति ॥ (६)
घोड़े के समान युद्ध के इच्छुक, दीप्तिशाली, देवों के लिए निचोड़े गए, पात्रों में फैले हुए एवं दशापवित्र द्वारा शुद्ध होते हुए सोम चारों ओर दौड़ते हैं. (६)
Aspiring to fight like a horse, radiant, squeezed for the gods, spread across characters and purified by the dashapavitra, Soma runs around. (6)