ऋग्वेद (मंडल 9)
अ॒या प॑वस्व देव॒युर्मधो॒र्धारा॑ असृक्षत । रेभ॑न्प॒वित्रं॒ पर्ये॑षि वि॒श्वतः॑ ॥ (१४)
हे देवाभिलाषी सोम! तुम अपनी धारा के रूप में नीचे गिरो. तुम्हारे मधुर रस की धाराएं बनाई जाती हैं. तुम शब्द करते हुए सब ओर से दशापवित्र पर जाते हो. (१४)
O God, Mon! You fall down as your stream. Streams of your sweet juices are made. You go to dashapavittra from all sides while making words. (14)