ऋग्वेद (मंडल 9)
आ॒विवा॑सन्परा॒वतो॒ अथो॑ अर्वा॒वतः॑ सु॒तः । इन्द्रा॑य सिच्यते॒ मधु॑ ॥ (५)
निचुड़े हुए सोम दूरवर्ती एवं समीपवर्ती देवों तथा इंद्र की सेवा के लिए मधु के समान सींचे जाते हैं. (५)
The stagnant somas are sewn like honey to serve the distant and adjacent devas and Indra. (5)